लय(जड़ता अथवा निद्रारूप अवसान) और विक्षेप(चंचलता) से रहित करके, जब मन को पूर्णतः निश्चल बना दिया जाता है,
और जब वह अमनीभाव(मन के अतिक्रमण की अवस्था) को प्राप्त हो जाता है, तब वही परम पद की प्राप्ति है।
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