मोह, भय, विषाद, निद्रा, तन्द्रा, रोग, जरा, शोक, भूख, प्यास, कृपणता, क्रोध, नास्तिकता, अज्ञान, मात्सर्य, दुर्बल करुणा, मूढ़ता, लज्जाहीनता, कपट, उद्धतता और असमता — ये सब तामस गुण से उत्पन्न अवस्थाएँ हैं।
इसी प्रकार तृष्णा, स्नेह, राग, लोभ, हिंसा, रति, दृष्टि-आसक्ति, व्यग्र प्रवृत्ति, ईर्ष्या, कामना, अस्थिरता, चञ्चलता, हरण की इच्छा, संग्रह, मित्रों के प्रति पक्षपात, परिग्रह का आश्रय, अनिष्ट विषयों से द्वेष तथा इष्ट विषयों में आसक्ति — ये सब राजस गुण से उत्पन्न अवस्थाएँ हैं।
इन समस्त तामस और राजस गुणों से परिपूर्ण और अभिभूत होकर यह भूतात्मा विविध प्रकार के रूपों और जन्मों को प्राप्त होता रहता है।
इस प्रकार यह अनेक प्रकार की अवस्थाओं को प्राप्त करता है, हाँ, निश्चय ही प्राप्त करता है।
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