"निस्सन्देह एक अन्य अपर आत्मा भी है, जो शुभ और अशुभ कर्मों के फलों से अभिभूत होकर सत् और असत् योनियों को प्राप्त होता है, तथा द्वन्द्वों(सुख-दुःख आदि) से प्रभावित होकर अधोगति और ऊर्ध्वगति में भटकता रहता है।
इसका विवेचन इस प्रकार है —
पाँच तन्मात्राएँ भी भूत कहलाती हैं और पाँच महाभूत भी भूत कहे जाते हैं।
इन सबका जो समुदाय है, उसे शरीर कहा जाता है; और इसी शरीर से सम्बद्ध सत्ता को भूतात्मा कहा गया है।
इस भूतात्मा के भीतर भी एक आत्मा है, जो कमल में स्थित जल-बिन्दु के समान है।
किन्तु यह भूतात्माप्रकृति के गुणों से अभिभूत हो जाता है। इसी कारण अभिभूत होकर वह मोह को प्राप्त होता है।
इस मोह के कारण वह अपने भीतर स्थित प्रभु, भगवान्, और समस्त कर्मों के प्रेरक को नहीं देख पाता।
वह गुणों के समूह में आसक्त होकर तुष्ट रहता है, मलिन हो जाता है, अस्थिर हो जाता है, चञ्चल हो जाता है, विषयों के प्रति लोभयुक्त हो जाता है, स्पृहायुक्त और व्यग्र हो जाता है।
फिर वह अहंकार को प्राप्त होकर इस प्रकार सोचने लगता है — "मैं ही यह हूँ, और यह सब मेरा है।"
इस प्रकार वह स्वयं ही अपने को स्वयं के द्वारा बाँध लेता है, जैसे कोई पक्षी जाल में फँस जाता है।
और अपने ही किए हुए कर्मों के फलों से अभिभूत होकर वह निरन्तर संसार-चक्र में भटकता रहता है।"
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