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मैत्रायण्य • अध्याय 1 • श्लोक 2
भगवन्नस्थिचर्मस्नायुमज्जामांसशुक्रशोणितश्लेष्माश्रुदूषिते। विण्मूत्रवातपित्तकफसंघाते दुर्गन्धे नि:सारेऽस्मिञ्छरीरे किं कामोपभोगैः॥
हे भगवन्! यह शरीर हड्डी, त्वचा, स्नायु, मज्जा, मांस, वीर्य, रक्त, अश्रु, विष्ठा, मल, मूत्र, वायु, पित्त, कफ आदि से परिपूर्ण है। यह शरीर दुर्गन्ध से युक्त एवं तत्त्वरहित है, तब कामनाजन्य भोगों की फिर क्या आवश्यकता है?
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