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महावाक्य • अध्याय 1 • श्लोक 7
सहस्त्रभानुमच्छुरिता पूरितत्वादलीया पारावारपूर इव। नैषा समाधिः । नैषा योगसिद्धिः । नैषा मनोलयः । ब्रह्मैक्यं तत् ॥
वह श्रेष्ठ तत्त्वज्ञान वृत्ति सहस्त्रो सूर्यों के प्रकाश से परिपूर्ण, निस्तरंग (तरंगरहित) समुद्र की जलराशि के सदृश, ब्रह्मभाव रस से युक्त एवं सदैव रहने वाली अर्थात् लय से रहित है। ऐसी स्थिति न तो समाधि की है और न ही योगसिद्धि की ही है; न ही मनोलय है; अपितु वह जीव-ब्रह्म की एकता ही है।
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