गुह्याद्गुह्यतर मेषा न प्राकृतायोपदेष्टव्या ।
सात्त्विकायान्तर्मुखाय परिशुश्रूषवे॥
इस उपनिषद् को सामान्य मनुष्यों के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गूढ़ से गूढ़तर (गोपनीय) है; किन्तु सात्त्विक गुणों से ओत-प्रोत, अन्तर्मुखी तथा अपने गुरुजनों की सेवादि में संलग्न मनुष्यों को ही इस उपनिषद् का उपदेश करना चाहिए।
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