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महावाक्य • अध्याय 1 • श्लोक 11
सोऽहमर्कः परं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः। आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसावदोम्॥
मैं ही वह चिद् आदित्य हूँ, मैं ही आदित्यरूप वह परम ज्योति हूँ, मैं ही वह शिव (कल्याणकारी तत्त्व) हूँ। मैं ही वह श्रेष्ठ आत्म ज्योति हूँ। सभी को प्रकाश प्रदान करने वाला शुक्र (ब्रह) मैं ही हूँ तथा उस (परमसत्ता) से कभी भी अलग नहीं रहता हूँ।
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