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कुमारसंभवम् • अध्याय 9 • श्लोक 40
विलोक्य यत्र स्फटिकरय भित्तौ सिद्धाङ्गनाः स्वं प्रतिबिम्बमारात् । भ्रान्त्या परस्या विमुखीभवन्ति प्रियेषु मानग्रहिला नमत्सु ॥
जहाँ स्फटिक दीवारों में अपना प्रतिबिंब देखकर सिद्धांगनाएँ भ्रमवश अपने प्रिय से विमुख हो जाती हैं, मानो मान से भरी हुई हों।
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