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कुमारसंभवम् • अध्याय 9 • श्लोक 3
विशृङ्खले पक्षतियुग्ममीषदुद्धानमानन्दगतिं मदेन । शुभ्रांशुवर्ण जटिलाग्रपादमितस्ततो मण्डलकैश्चरन्तम् ॥
उसके पंखों का युग्म कुछ बिखरा हुआ था, आनंद से भरी चाल में मदोन्मत्त होकर चलता हुआ, चन्द्र के समान उज्ज्वल रंग वाला, उलझे अग्रपादों से इधर-उधर गोल-गोल घूम रहा था।
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