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कुमारसंभवम् • अध्याय 9 • श्लोक 27
अलक्तकं पादसरोरुहाग्रे सरोरुहाक्ष्याः किल सन्निवेश्य । स्वमौलिगङ्गासलिलेन हस्ता रुणत्वमक्षालयदिन्दुचूडः ॥
उसने उसके चरणकमलों पर अलक्तक लगाया और अपने मस्तक की गंगा के जल से अपने हाथों की लालिमा धो ली।
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