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कुमारसंभवम् • अध्याय 9 • श्लोक 25
नखव्रणश्रेणिवरे बबन्ध नितम्बबिम्बे रशनाकलापम् । चलस्वचेतोमृगबन्धनाय मनोभुवः पाशमिव स्मरारिः ॥
उसने नितम्ब पर नखचिह्नों की रेखाओं के ऊपर रेशमी मेखला बाँधी, जो मन के चंचल मृग को बाँधने वाले कामदेव के पाश के समान थी।
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