तस्याः स कण्ठे पिहितस्तनाग्रां न्यधत्त मुक्ताफलहारवल्लीम् । या प्राप मेरुद्वितयस्य मूर्ध्नि स्थितस्य गाङ्गौघयुगस्य लक्ष्मीम् ॥
उसने उसके कण्ठ पर स्तनों को ढकती हुई मोतियों की माला धारण कराई, जो मानो मेरु के शिखर पर स्थित गंगा की धारा की शोभा हो।
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