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कुमारसंभवम् • अध्याय 9 • श्लोक 23
रथस्य कर्णावभि तन्मुखस्य ताटङ्कचक्रद्वितयं न्यधात्सः । जगज्जिगीषुर्विषमेषुरेष ध्रुवं यमारोहति पुष्पचापः ॥
उसने उसके मुख के दोनों ओर कानों में ताटंक रूपी चक्र धारण कराए, मानो जगत को जीतने वाला कामदेव अपने पुष्पधनुष पर चढ़ रहा हो।
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