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कुमारसंभवम् • अध्याय 9 • श्लोक 19
हरो विकीर्ण घनघर्मतोयै नेत्राञ्जनाङ्क हृदयप्रियायाः । द्वितीयकौपीनचलाञ्चलेना हरन्मुखेन्दोरकलङ्किनोऽस्याः ॥
हर ने प्रिय के नेत्रों के अंजन से युक्त मुख पर गिरे हुए पसीने को अपने वस्त्र के किनारे से पोंछ दिया।
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