स प्रजागरकषायलोचनं गाढदन्तपदताडिताधरम् । आकुलालकमरंस्त रागवान्प्रेक्ष्य भिन्नतिलकं प्रियामुखम् ॥
उसने जागरण से थकी आँखों, दाँतों के चिह्नों से स्पर्शित अधरों, बिखरे केशों और धुंधले तिलक से युक्त प्रिय के मुख को प्रेमपूर्वक देखा।
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