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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 71
पश्य कल्पतरुलम्बि शुद्धया ज्योत्स्नया जनितरूपसंशयम् । मारुते चलति चण्डि केवलं व्यज्यते विपरिवृत्तमंशुकम् ॥
देखो, कल्पवृक्षों पर लटकी हुई शुद्ध चन्द्रिका से रूप का भ्रम उत्पन्न हो रहा है; हे चण्डि, वायु के चलने पर केवल उलटा हुआ वस्त्र ही प्रकट होता है।
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