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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 70
एतदुच्छ्रुसितपीतमैन्दवं वोढुमक्षममिव प्रभारसम् । मुक्तषद्वदविरावमञ्जसा भिद्यते कुमुदमा निबन्धनात् ॥
यह कुमुद मानो चन्द्रमा की प्रबल आभा को सहन न कर पाने के कारण अपने बंधन से मुक्त होकर सहज ही खिल उठता है।
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