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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 63
अङ्गुलीभिरिव केशसञ्चयं सन्निगृह्य तिमिरं मरीचिभिः । कुङ्गलीकृतसरोजलोचनं चुम्बतीव रजनीमुखं शशी ॥
चन्द्रमा अपनी किरणों से अंधकार को मानो केशों की भाँति पकड़कर, कमलनयन रात्रि के मुख को चूमता हुआ प्रतीत होता है।
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