नोर्ध्वमीक्षणगतिर्न चाप्यधो नाभितो न पुरतो न पृष्ठतः । लोक एष तिमिरौधवेष्टितो गर्भवास इव वर्तते निशि ॥
रात्रि में यह संसार ऐसा हो जाता है कि न ऊपर, न नीचे, न आगे, न पीछे कुछ दिखाई देता है; अंधकार से घिरा हुआ यह मानो गर्भ में स्थित प्रतीत होता है।
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