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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 4
नाभिदेशनिहितः सकम्पया शङ्करस्य रुरुधे तया करः । तद्दुकूलमथ चाभवत्स्वयं दूरमुच्वसितनीविबन्धनम् ॥
उसने काँपते हुए हाथ से शंकर की नाभि के पास अपना हाथ रखा और रोका, पर उसके वस्त्र का बंधन स्वयं ही ढीला होकर दूर हो गया।
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