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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 39
बद्धकोशमपि तिष्ठति क्षणं सावशेषविवरं कुशेशयम् । षड्डाय वसतिं ग्रहीष्यते प्रीतिपूर्वमिव दातुमन्तरम् ॥
कमल, बंद होने पर भी, अपने भीतर थोड़ी जगह छोड़कर ठहरता है, मानो मधुमक्खियों को रहने के लिए स्थान देने को तत्पर हो।
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