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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 35
उत्तरन्ति विनिकीर्य पल्वलं गाढपङ्कमतिवाहितातपाः । दंष्ट्रिणो बनवराहयूथपा दष्टभङ्गुरबिसाङ्कुरा इव ॥
अत्यधिक गर्मी से व्याकुल वन के वराह अपने दाँतों से गहरे कीचड़ को उखाड़ते हुए बाहर निकलते हैं, जैसे बिखरे हुए बिस के अंकुर हों।
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