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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 32
दष्टतामरसकेसरस्रजोः क्रन्दतोर्विपरिवृत्तकण्ठयोः । निघ्नयोः सरसि चक्रवाकयोरल्पमन्तरमनल्पतां गतम् ॥
कमल के केसरों की माला चोंच में दबाए हुए, विपरीत दिशाओं में मुड़े कंठ से रोते हुए चक्रवाक युगल के बीच का छोटा अंतर भी बहुत बड़ा प्रतीत हो रहा है।
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