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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 21
सोऽनुमान्य हिमवन्तमात्मभूरात्मजाविरहदुःखखेदितम् । तत्र तत्र विजहार सम्पतन्नप्रमेयगतिना ककुद्मता ॥
उसने आत्मजा के विरह से दुःखी हिमवान को सांत्वना देकर, अपनी अप्रमेय गति वाले वृष पर सवार होकर इधर-उधर विहार किया।
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