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कुमारसंभवम् • अध्याय 8 • श्लोक 2
व्याहृता प्रतिवचो न सन्दधे गन्तुमैच्छदवलम्बितांशुका । सेवते स्म शयनं पराङ्मुखी सा तथापि रतये पिनाकिनः ॥
कहा जाने पर भी उसने उत्तर नहीं दिया, वस्त्र पकड़े हुए जाने की इच्छा की, और मुँह फेरकर शय्या पर बैठ गई, फिर भी पिनाकी के साथ रति के लिए तैयार थी।
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