भावसूचितमदृष्टविप्रियं चाटुमत्क्षणवियोगकातरम् । कैश्चिदेव दिवसैस्तदा तयोः प्रेम रूढमितरेतराश्रयम् ॥
भावों से प्रकट प्रेम, बिना किसी अप्रियता के, मधुर वचनों और क्षणिक वियोग की व्याकुलता से युक्त होकर, कुछ ही दिनों में उनका प्रेम परस्पर आश्रित होकर दृढ़ हो गया।
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