दर्पणे च परिभोगदर्शिनी पृष्ठतः प्रणयिनो निषेदुषः । प्रेक्ष्य बिम्बमनु बिम्बमात्मनः कानि कानि न चकार लज्जया ॥
दर्पण में पीछे बैठे प्रिय के साथ अपने मिलन का प्रतिबिंब देखकर, उसने अपने ही प्रतिबिंब के अनुसार लज्जा से अनेक प्रकार की चेष्टाएँ कीं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।