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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 88
क्लृप्तोपचारां चतुरस्रवेदीं तावेत्य पश्चाङ्कनकासनस्थौ । जायापती लौकिकमेषितव्यमार्द्राक्षतारोपणमन्वभूताम् ॥
विधिपूर्वक सुसज्जित चतुष्कोण वेदी पर पहुँचकर, वे दोनों स्वर्ण आसन पर बैठे और लौकिक रीति से आर्द्र अक्षत अर्पण का कार्य किया।
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