दीक्षा-विधि के नवीन स्पर्श से वह कन्या ऐसी शोभा पा रही थी, मानो कृष्णपक्ष के अंत में सूर्य के स्पर्श से प्रज्वलित होती हुई चंद्रकला हो।
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