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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 79
प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृशानोरुदर्चिषस्तन्मिथुनं चकासे । मेरोरुपान्तेष्विव वर्तमानमन्योन्यसंसक्तमहस्त्रियामम् ॥
अग्नि की परिक्रमा करते समय वह युगल ऐसी शोभा पा रहा था जैसे मेरु पर्वत के समीप परस्पर जुड़े हुए दिन और रात्रि।
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