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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 78
प्रयुक्तपाणिग्रहणं यदन्यद्वधूवरं पुष्यति कान्तिमय्याम् । सान्निध्ययोगादनयोस्तदानीं किं कथ्यते श्रीरुभयस्य तस्य ॥
जहाँ अन्य वधू-वर का पाणिग्रहण उनकी शोभा को बढ़ाता है, वहाँ इन दोनों के सान्निध्य से उस समय दोनों की शोभा का वर्णन करना कठिन है।
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