उसके बढ़ते हुए मुखचंद्र की कान्ति से कुमार के नेत्र कमल की भाँति खिल उठे और शिव का मन जल की भाँति निर्मल हो गया, जैसे शरद ऋतु में संसार प्रसन्न हो जाता है।
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