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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 62
तासां मुखैरासवगन्धगव्र्व्याप्तान्तराः सान्द्रकुतूहलानाम् । विलोलनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षाः सहस्रपत्राभरणा इवासन् ॥
उनकी मुख से निकली मदिरा की सुगंध से भरे हुए और तीव्र उत्सुकता से युक्त, उनकी चंचल नेत्ररूपी भौंरों से युक्त खिड़कियाँ मानो सहस्रदल कमलों से सुसज्जित प्रतीत हो रही थीं।
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