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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 60
जालान्तरप्रेषितदृष्तिरन्या प्रस्थानभिन्नां न बबन्ध नीवीम् । नाभिप्रविष्टाभरणप्रभेण हस्तेन तस्थाववलम्ब्य वासः ॥
एक अन्य स्त्री ने जाली के भीतर से दृष्टि भेजते हुए, जल्दी में ढीली हुई अपनी नीवी को नहीं बाँधा और नाभि तक पहुँचे आभूषण की चमक के बीच वस्त्र को हाथ से संभालकर खड़ी रही।
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