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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 55
स प्रीतियोगाद्विकसन्मुखश्रीर्जामातुरग्रेसरतामुपेत्य । प्रावेशयन्मन्दिरमृद्धमेनमागुल्फकीर्णापणमार्गपुष्पम् ॥
प्रसन्नता से खिले मुख वाला वह, जामाता के अग्रगामी बनकर, उसे उस समृद्ध भवन में ले गया जिसके मार्ग फूलों से भरे हुए थे।
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