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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 49
खे खेलगामी तमुवाह वाहः सशब्दचामीकरकिङ्किणीकः । तटाभिघातादिव लग्नपङ्के धुन्वन्मुहुः प्रोतघने विषाणे ॥
आकाश में गतिशील उसका वाहन, स्वर्ण घंटियों की ध्वनि करता हुआ, अपने सींगों से बार-बार आघात करता हुआ, मानो किनारे से टकराकर कीचड़ को हटाता हुआ उसे ले जा रहा था।
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