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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 40
ततो गणैः शूलभृतः पुरोगैरुदीरितो मङ्गलतूर्यघोषः । विमानशृङ्गाण्यवगाहमानः शशंस सेवावसरे सुरेभ्यः ॥
तत्पश्चात त्रिशूलधारी के अग्रगामी गणों द्वारा मंगल वाद्यों का घोष किया गया, जो विमान शिखरों में गूँजता हुआ देवताओं को सेवा के अवसर का संकेत देने लगा।
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