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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 4
एकैव सत्यामपि पुत्रपङ्कौ चिरस्य दृष्टेव मृतोत्थितेव । आसन्नपाणिग्रहणेति पित्रोरुमा विशेषोच्छ्रुसितं बभूव ॥
यद्यपि पुत्रों की पंक्ति में वह एक ही थी, फिर भी बहुत समय बाद देखी हुई या मृत से जीवित हुई जैसी प्रतीत हो रही थी; पाणिग्रहण के समीप होने पर उमा को देखकर उसके माता-पिता विशेष रूप से भावविह्वल हो उठे।
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