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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 38
तं मातरो देवमनुव्रजन्त्यः स्ववाहनक्षोभचलावतंसाः । मुखैः प्रभामण्डलरेणुगौरैः पद्माकरं चकुरिवान्तरीक्षम् ॥
उस देव का अनुसरण करती हुई देवमाताएँ, अपने-अपने वाहनों के कंपन से हिलते हुए आभूषणों सहित, अपने मुखों की प्रभा से आकाश को मानो कमलों से भर देती थीं।
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