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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 37
स गोपतिं नन्दिभुजावलम्बी शार्दूलचर्मान्तरितोरुपृष्ठम् । तद्भक्तिसङ्क्षिप्त बृहत्प्रमाणमारुह्य कैलासमिव प्रतस्थे ॥
वह नंदी के भुजाओं का सहारा लेकर, बाघचर्म से आच्छादित पीठ पर स्थित होकर, अपनी महत्ता को भक्तिभाव से संकुचित कर, मानो कैलास पर आरूढ़ होकर चल पड़ा।
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