स गोपतिं नन्दिभुजावलम्बी शार्दूलचर्मान्तरितोरुपृष्ठम् । तद्भक्तिसङ्क्षिप्त बृहत्प्रमाणमारुह्य कैलासमिव प्रतस्थे ॥
वह नंदी के भुजाओं का सहारा लेकर, बाघचर्म से आच्छादित पीठ पर स्थित होकर, अपनी महत्ता को भक्तिभाव से संकुचित कर, मानो कैलास पर आरूढ़ होकर चल पड़ा।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।