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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 35
दिवापि निष्यूतमरीचिभासा बाल्यादनाविष्कृतलाञ्छनेन । चन्द्रेण नित्यं प्रतिभिन्नमौलेश्रूडामणेः किं ग्रहणं हरस्य ॥
जो चंद्रमा दिन में भी अपनी किरणों से प्रकाशित रहता है और बाल्यकाल से ही जिसका चिह्न प्रकट नहीं हुआ, उस चंद्र को मस्तक पर धारण करने वाले हर के लिए किसी अन्य आभूषण की क्या आवश्यकता है।
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