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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 34
यथाप्रदेशं भुजगेश्वराणां करिश्यतामाभरणान्तरत्वम् । शरीरमात्रं विकृतिं प्रपेदे तथैव तस्थुः फणरत्नशोभाः ॥
भुजंगों को विभिन्न स्थानों पर आभूषणों के रूप में धारण करने पर भी शरीर मात्र में ही परिवर्तन हुआ, किन्तु उनके फणों के रत्नों की शोभा वैसे ही बनी रही।
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