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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 33
शङ्खान्तरद्योति विलोचनं यदन्तर्निविष्टामलपिङ्गतारम् । सान्निध्यपक्षे हरितालमय्यास्तदेव जातं तिलकक्रियायाः ॥
उसकी आँखें, जो शंख के भीतर की चमक के समान थीं और जिनमें स्वच्छ पीत आभा समाई हुई थी, समीप आने पर वही हरितालमय तिलक के समान प्रतीत हुईं।
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