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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 32
बभूव भस्मैव सिताङ्गरागः कपालमेवामलशेखरश्रीः । उपान्तभागेषु च रोचनाङ्को गजाजिनस्यैव दुकूलभावः ॥
भस्म ही उसके शरीर का उज्ज्वल अंगराग बन गया, कपाल ही निर्मल शिरोभूषण बन गया, और अंगों के समीप रोचना के चिह्न तथा गजचर्म ही उसके वस्त्र के समान हो गए।
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