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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 25
बबन्ध चास्त्राकुलदृष्टिरस्याः स्थानान्तरे कल्पितसन्निवेशम् । धात्र्यङ्गुलीभिः प्रतिसार्यमाणमूर्णमयं कौतुकहस्तसूत्रम् ॥
धायिका की उँगलियों द्वारा समायोजित किया जाता हुआ ऊन का कौतुक हस्तसूत्र, उसकी चंचल दृष्टि के कारण बार-बार स्थान बदलते हुए, ठीक प्रकार से बाँधा गया।
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