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कुमारसंभवम् • अध्याय 7 • श्लोक 18
रेखाविभक्तश्च विभक्तगात्र्याः किञ्चिन्मधूच्छिष्टविमृष्टरागः । कामप्यभिख्यां स्फुरितैरपुष्यदासन्नलावण्यफलोऽभ्ररोष्ठः ॥
उसके अंगों की रेखाओं से विभक्त शरीर पर मधु के अवशेष से स्पर्श किया हुआ हल्का रंग, उसके अधरों पर उभरते हुए सौंदर्य के फल के समान एक विशेष आभा उत्पन्न कर रहा था।
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