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कुमारसंभवम् • अध्याय 6 • श्लोक 87
इदमत्रोत्तरं न्याय्यमिति बुद्ध्या विमृश्य सः । आददे वचसामन्ते मङ्गलालङ्कृतां सुताम् ॥
ऐसा विचार कर हिमालय ने अपनी अलंकृत पुत्री को उत्तरस्वरूप स्वीकार किया।
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