अच्छिन्नामलसन्तानाः समुद्रोम्र्म्यनिवारिताः । पुनन्ति लोकान्पुण्यत्वात्कीर्तयः सरितश्च ते ॥
तुम्हारी नदियाँ और कीर्तियाँ निरंतर प्रवाहित होकर संसार को पवित्र करती हैं।
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