उपपन्नमिदं सर्वमतः परमपि त्वयि । मनसः शिखराणां च सदृशी ते समुन्नतिः ॥
यह सब तुम्हारे लिए उपयुक्त है; तुम्हारी महानता मन और पर्वतों दोनों की ऊँचाई के समान है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।