न केवलं दीसंस्थं भास्वतां दर्शनेन वः । अन्तर्गतमपास्तं मे रजसोऽपि परं तमः ॥
आपके दर्शन से केवल बाहरी अंधकार ही नहीं, बल्कि मेरे भीतर का अज्ञान भी दूर हो गया है।
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